मेरे एक दोस्त ने पिछले साल जिम जॉइन किया और सीधा टोंड मिल्क का पैकेट उठा लाया। उसका तर्क सुनिए: "भाई, टोंड मतलब बॉडी टोन करने वाला दूध।"
वो गलत था। बुरी तरह गलत।
Toned milk meaning in hindi ढूँढने वाले ज़्यादातर लोग यही सोचकर आते हैं कि "टोंड" का रिश्ता फिटनेस से है। नहीं है। टोंड मिल्क का मतलब है वो दूध जिसमें से फैट निकालकर उसे पतला किया गया हो, ताकि वो सस्ता भी पड़े और हल्का भी रहे। शरीर से इसका कोई लेना-देना नहीं। ये एक प्रोसेसिंग का नाम है, किसी फायदे का दावा नहीं।
छोटा जवाब
टोंड दूध यानी वो दूध जिसमें भैंस के गाढ़े दूध में स्किम्ड मिल्क पाउडर और पानी मिलाकर फैट घटाकर लगभग 3% कर दिया गया हो। प्रोटीन और कैल्शियम लगभग उतने ही रहते हैं। सिर्फ़ चिकनाई कम होती है।
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टोंड दूध वो है जिसमें भैंस के गाढ़े दूध में स्किम्ड मिल्क पाउडर और पानी मिलाकर फैट की मात्रा घटाकर करीब 3% पर लाई जाती है।
बस इतना ही। ये कोई अलग जानवर का दूध नहीं है। कोई अलग नस्ल नहीं। वही दूध है, जिसका क्रीम वाला हिस्सा कम कर दिया गया।
"टोनिंग" शब्द का मतलब यहाँ है, तेज़ चीज़ को हल्का करना। जैसे पेंट में सफ़ेद मिलाकर शेड हल्का करते हैं, वैसे ही गाढ़े भैंस के दूध में स्किम्ड दूध मिलाकर उसकी फैट हल्की की जाती है। फर्क ये है कि इसमें प्रोटीन और कैल्शियम लगभग उतना ही बचा रहता है।
यहाँ वो बात है जो ऊपर रैंक करने वाले ज़्यादातर पेज नहीं बताते।
टोंड मिल्क कोई विदेशी आइडिया नहीं है। ये भारत की अपनी खोज है, और इसके पीछे वजह सेहत नहीं, गणित था।
भारत में भैंस का दूध बहुत गाढ़ा होता है। फैट 6% से 7% तक चला जाता है। शहरों में दूध की कमी थी और भैंस का दूध महँगा पड़ता था। तो सोचा गया कि अगर इस गाढ़े दूध में स्किम्ड मिल्क पाउडर और पानी मिला दिया जाए, तो वही दूध ज़्यादा लोगों तक पहुँच सकता है, पोषण भी बहुत ज़्यादा नहीं गिरेगा, और दाम भी काबू में रहेगा।
यही "टोनिंग" है। एक सप्लाई की समस्या का हल, जिसे बाद में सेहत के फायदे के तौर पर बेचा जाने लगा।
इसीलिए "toned milk" शब्द आपको यूरोप या अमेरिका के पैकेट पर नहीं दिखेगा। वहाँ whole, semi-skimmed, skimmed लिखा मिलेगा। टोंड शब्द भारतीय डेयरी की शब्दावली है।
दुकान पर खड़े होकर लोग ब्रांड देखते हैं। नंबर कोई नहीं देखता। जबकि असली जानकारी वहीं छिपी है।
FSSAI ने हर तरह के दूध के लिए कम से कम फैट और SNF तय किया हुआ है। SNF यानी Solids Not Fat, दूध का वो हिस्सा जिसमें प्रोटीन, लैक्टोज़ और मिनरल आते हैं।
| दूध का प्रकार | कम से कम फैट | कम से कम SNF |
|---|---|---|
| फुल क्रीम | 6.0% | 9.0% |
| स्टैंडर्डाइज़्ड | 4.5% | 8.5% |
| टोंड | 3.0% | 8.5% |
| डबल टोंड | 1.5% | 9.0% |
| स्किम्ड | 0.5% से कम | 8.7% |
एक चीज़ गौर कीजिए। डबल टोंड में फैट सबसे कम है, लेकिन SNF 9% है, टोंड से ज़्यादा। मतलब फैट घटाने पर प्रोटीन नहीं घटता। ठोस हिस्सा उतना ही रहता है, बल्कि थोड़ा बढ़ जाता है।
खरीदते वक़्त पैकेट पलटिए और ये दोनों आँकड़े देख लीजिए। अगर टोंड लिखा है और फैट 3% से कम है, वो कानूनी तौर पर टोंड दूध नहीं है।
एक ही पैकेट पर तीनों लिखे होते हैं, और लोग मान लेते हैं कि तीनों का मतलब एक ही है। नहीं है।
Toned बताता है कि फैट कितना है। ये मात्रा की बात है।
Pasteurised बताता है कि दूध को गर्म करके बैक्टीरिया मारे गए हैं। आम तौर पर दो तरीके चलते हैं, 63°C पर तीस मिनट, या 72°C पर पंद्रह सेकंड। ये सुरक्षा की बात है, फैट से कोई रिश्ता नहीं।
Homogenized बताता है कि फैट के कण तोड़कर पूरे दूध में बराबर फैला दिए गए हैं, ताकि ऊपर मलाई की परत न जमे। लोग सोचते हैं दूध नकली है। दूध नकली नहीं है, बस मशीन से गुज़रा है। इन दोनों प्रोसेस का फर्क हमने पाश्चराइज़्ड और होमोजिनाइज़्ड दूध वाली गाइड में विस्तार से समझाया है।
तो जब पैकेट पर "Pasteurised Toned Milk, Homogenized" लिखा हो, उसका मतलब है: फैट 3%, बैक्टीरिया मारे गए, मलाई नहीं जमेगी। तीन अलग जानकारियाँ, एक लाइन में।
100 मिलीलीटर टोंड दूध में मोटे तौर पर 58 से 60 कैलोरी होती हैं। प्रोटीन करीब 3 ग्राम। फैट लगभग 3 ग्राम। कैल्शियम 120 मिलीग्राम के आसपास। कार्बोहाइड्रेट करीब 4.7 ग्राम, जो ज़्यादातर लैक्टोज़ है।
फुल क्रीम में यही 100 मिलीलीटर करीब 90 कैलोरी देता है, क्योंकि फैट दोगुना है।
अब हिसाब लगाइए। रोज़ आधा लीटर दूध पीने वाला आदमी अगर फुल क्रीम से टोंड पर आ जाए, तो दिन में करीब 150 कैलोरी कम कर रहा है। प्रोटीन और कैल्शियम में फर्क बहुत मामूली रहेगा। महीने भर में ये अंतर दिखने लगता है।
विटामिन A और D फैट में घुलते हैं, पानी में नहीं। मतलब वो दूध की चिकनाई वाले हिस्से में बैठते हैं। तो जब फैट निकाला जाता है, इन दोनों विटामिन का कुछ हिस्सा भी साथ चला जाता है।
इसीलिए ज़्यादातर बड़ी डेयरियाँ टोंड दूध में ये दोनों विटामिन दोबारा मिलाती हैं। पैकेट पर छोटे अक्षरों में "fortified with Vitamin A and D" लिखा होता है। लोग इसे मार्केटिंग समझकर छोड़ देते हैं। असल में वो जानकारी है कि जो निकाला गया था, वो वापस डाला गया है।
घर पर मलाई हटाकर बनाए गए टोंड दूध में ये वापसी नहीं होती। यानी घर का "टोंड" दूध फैट में तो पैकेट जैसा हो सकता है, विटामिन में नहीं।
भारत में दूध का सबसे बड़ा इस्तेमाल पीने में नहीं होता। चाय में होता है। और यहीं टोंड दूध की असली परीक्षा है।
फुल क्रीम दूध की चाय गाढ़ी बनती है क्योंकि फैट उबलते वक़्त चाय को एक भारीपन देता है। टोंड दूध की चाय उसके मुकाबले पतली लगेगी। रंग भी थोड़ा हल्का आएगा।
इसका हल ये नहीं है कि दूध ज़्यादा डाल दें, उससे कैलोरी की बचत खत्म हो जाती है। हल ये है कि दूध को थोड़ा ज़्यादा देर उबालें ताकि पानी उड़े और वो अपने आप गाढ़ा हो जाए। चायवाले यही करते हैं, बस कोई बताता नहीं।
खीर, रबड़ी या पनीर बनाना हो तो टोंड दूध से बचिए। पनीर कम निकलेगा और भुरभुरा रहेगा। इसी वजह से असली देसी घी फुल क्रीम दूध से बनता है, टोंड से नहीं। दही जम जाएगी, पर पतली। रोज़ की चाय, दलिया, कॉफ़ी और सादा गिलास, इन सब में टोंड दूध बिल्कुल चलता है।
पैकेट वाले टोंड दूध का सबसे बड़ा फायदा यही है कि उस पर नंबर छपा होता है। 3% फैट, 8.5% SNF। कोई कंपनी उससे कम देगी तो वो कानून तोड़ रही है। खुले दूध पर कोई नंबर नहीं होता, सिर्फ़ दूधवाले का भरोसा होता है।
दूसरी तरफ़, खुले दूध में आपको पता होता है कि वो किस गाय या भैंस का है। पैकेट वाला दूध सैकड़ों जानवरों का मिला-जुला होता है।
घर पर एक मोटा टेस्ट: किसी ढलान वाली चिकनी सतह पर दूध की एक बूँद गिराइए। शुद्ध दूध धीरे बहेगा और पीछे हल्की सफ़ेद लकीर छोड़ेगा। ज़्यादा पानी वाला दूध तेज़ी से फिसल जाएगा और कोई निशान नहीं छोड़ेगा। सही नाप चाहिए तो लैक्टोमीटर दो सौ रुपये में आ जाता है। दूध असली है या नकली, ये पहचानने के और तरीके भी हैं।
रखने की बात भी कर लें। खोलने के बाद पैकेट वाला दूध फ्रिज में दो दिन से ज़्यादा नहीं चलता। खुला दूध उबालकर रखें तो एक दिन। फ्रिज का दरवाज़ा सबसे गर्म हिस्सा होता है, इसलिए दूध वहाँ नहीं, अंदर की शेल्फ़ पर रखिए।
आप दूध लीटर से नहीं खरीद रहे। आप प्रोटीन और कैल्शियम खरीद रहे हैं, और वो दोनों SNF में हैं, फैट में नहीं।
टोंड और फुल क्रीम में SNF लगभग बराबर है, पर दाम में फर्क है। मतलब टोंड दूध में आपको उतना ही प्रोटीन और कैल्शियम कम पैसे में मिल रहा है। जो चीज़ कम मिल रही है वो सिर्फ़ फैट है, जो वैसे भी आपकी बाकी डाइट में भरपूर है। जयपुर में देसी गाय के दूध के मौजूदा दाम अलग से देख सकते हैं।
यही टोंड दूध की सबसे साफ़ वजह है। कैल्शियम और प्रोटीन वही, चिकनाई आधी। जो लोग दूध छोड़ना नहीं चाहते लेकिन कैलोरी गिनते हैं, उनके लिए ये सीधा सौदा है।
फैट कम है तो सैचुरेटेड फैट भी कम है। जिन लोगों को डॉक्टर ने चिकनाई घटाने को कहा है, उनके लिए टोंड या डबल टोंड समझदारी है। पर साफ़ कह दूँ, दूध बदलने से कोलेस्ट्रॉल ठीक नहीं होता। ये पूरी डाइट का एक छोटा हिस्सा है।
कैल्शियम फैट में नहीं होता, SNF में होता है। इसलिए फैट घटाने से कैल्शियम पर असर नहीं पड़ता। बच्चों और बुज़ुर्गों के लिए टोंड दूध कैल्शियम का उतना ही अच्छा स्रोत है जितना फुल क्रीम।
टोंड दूध और A2 दूध एक ही चीज़ के दो नाम नहीं हैं। ये दो बिल्कुल अलग पैमाने हैं, और यहीं सबसे ज़्यादा गड़बड़ होती है।
टोंड बताता है कि दूध में फैट कितना है। A2 बताता है कि दूध में प्रोटीन किस किस्म का है।
गाय के दूध में बीटा-केसीन नाम का प्रोटीन होता है, जो दो रूपों में आता है, A1 और A2। जर्सी और HF जैसी विदेशी नस्लों के दूध में अक्सर A1 मिलता है। गिर, साहीवाल और थारपारकर जैसी देसी नस्लें कुदरती तौर पर A2 प्रोटीन वाला दूध देती हैं। A1 और A2 का पूरा फर्क यहाँ पढ़िए।
अब समझिए। आप A2 दूध को भी टोंड कर सकते हैं। आप टोंड दूध में A1 प्रोटीन भी पा सकते हैं। दोनों बातें एक साथ सच हो सकती हैं, क्योंकि वो अलग-अलग चीज़ें नाप रही हैं।
जयपुर में हमने Sunrise A2 Milk इसी वजह से शुरू किया था। लोग हमारे पास आकर कहते थे कि उन्होंने टोंड, डबल टोंड, स्किम्ड सब आज़मा लिया और फिर भी पेट ठीक नहीं रहता। वो फैट का पैमाना बदल-बदल कर देख रहे थे, जबकि दिक्कत दूसरी जगह थी। गिर और थारपारकर गायों के दूध पर आने के बाद उनमें से बहुत लोगों की शिकायत खत्म हो गई।
तो अगर आप सिर्फ़ कैलोरी घटाना चाहते हैं, टोंड दूध ठीक है। अगर आपको दूध पीने के बाद पेट भारी लगता है, तो फैट का नंबर नहीं, नस्ल देखिए। A2 दूध और पाचन का रिश्ता अलग लेख में विस्तार से लिखा है।
फुल क्रीम दूध लीजिए, उबालिए, ठंडा कीजिए और ऊपर जमी मलाई हटा दीजिए। एक बार ऐसा करने पर फैट काफ़ी गिर जाता है। दो बार करने पर वो डबल टोंड के करीब पहुँच जाएगा।
घर पर बनाए दूध का फैट कितना है, ये आप ठीक-ठीक नहीं जान सकते। तो अगर डॉक्टर ने कोई सख़्त सीमा बताई है, पैकेट वाला दूध ही लीजिए जिस पर नंबर छपा हो।
पैकेट उठाइए। पलटिए। फैट और SNF का नंबर देखिए। "टोंड" शब्द पर भरोसा मत कीजिए, नंबर पर कीजिए।
कैलोरी कम करनी है तो टोंड। और कम करनी है तो डबल टोंड। बच्चे के लिए है तो फुल क्रीम। पेट भारी होता है तो फैट का खेल छोड़िए, नस्ल पर जाइए। बाकी सब मार्केटिंग है। और अगर जयपुर में रहते हैं तो रोज़ की डिलीवरी यहाँ से शुरू कर सकते हैं।
टोंड मिल्क यानी वो दूध जिसमें भैंस के गाढ़े दूध में स्किम्ड मिल्क पाउडर और पानी मिलाकर फैट घटाकर लगभग 3% कर दिया गया हो। इसे हिंदी में टोंड दूध कहते हैं।
टोंड दूध में कम से कम 3% फैट होता है, डबल टोंड में 1.5%। दिलचस्प बात ये कि डबल टोंड में SNF 9% होता है, टोंड के 8.5% से ज़्यादा। यानी फैट आधा, प्रोटीन बराबर।
हाँ। ये सामान्य दूध ही है जिसकी चिकनाई कम की गई है। दो साल से छोटे बच्चों को छोड़कर, बाकी लोगों के लिए रोज़ पीना ठीक है।
अकेले दूध बदलने से वज़न नहीं घटता। पर फुल क्रीम से टोंड पर आने से आधा लीटर पर करीब 150 कैलोरी बचती हैं। बाकी डाइट सही हो तो ये फर्क काम आता है।
जमती है, बस थोड़ी पतली रहेगी। गाढ़ी दही चाहिए तो फुल क्रीम लीजिए, या टोंड दूध को थोड़ा और उबालकर गाढ़ा कर लीजिए।
पैकेट वाला पाश्चराइज़्ड दूध पहले ही गर्म होकर आता है, तो सीधे पिया जा सकता है। ज़्यादातर भारतीय घरों में फिर भी उबाला जाता है और इससे कोई नुकसान नहीं। बस लंबा उबालने पर कुछ विटामिन कम हो जाते हैं।
पानी और स्किम्ड मिल्क पाउडर मिलाना टोंड दूध की परिभाषा का हिस्सा है, मिलावट नहीं। मिलावट तब है जब FSSAI के तय 3% फैट और 8.5% SNF से कम निकले। शुद्ध देसी गाय का दूध कैसे पहचानें, ये अलग से पढ़ने लायक है।
टोंड फैट की मात्रा बताता है, A2 प्रोटीन की किस्म बताता है। दोनों अलग पैमाने हैं। A2 दूध भी टोंड हो सकता है, और टोंड दूध में A1 प्रोटीन भी हो सकता है। A2 दूध क्यों चुनें, ये यहाँ समझाया है।
खोलने के बाद फ्रिज में दो दिन। बिना खोले पैकेट पर छपी तारीख तक। फ्रिज के दरवाज़े में नहीं, अंदर की शेल्फ़ पर रखिए, वहाँ ठंडक ज़्यादा स्थिर रहती है।